शासन ऐसा कि विपक्षियों में क्या अपनों में भी खौफ था... गुरु गुड़ ही रहा चेला चला बनने शक्कर (घनचक्कर)….

शासन ऐसा कि विपक्षियों में क्या अपनों में भी खौफ था... गुरु गुड़ ही रहा चेला चला बनने शक्कर (घनचक्कर)….

@रमेश साहू

शासन ऐसा कि विपक्षियों में क्या अपनों में भी खौफ था
गुरु गुड़ ही रहा चेला चला बनने शक्कर (घनचक्कर)….
 
बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय.
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय.

जीवन दर्शन कि ये पंक्तियां सूफी कवि रहीम की लिखी हुई है जो समन्वय और सामंजस्य की बातों को कहते, लिखते और खुद आचरित करते थे उनकी लिखी इन पंक्तियों को स्कूली किताबों में भी जगह मिली ।सो  प्रदेश के माननीयों ने भी इस दोहे को पढ़ा होगा, गुना होगा, और उसका अर्थ भी जानते होंगे ,संकट ये  है कि उसे  आचरित नहीं कर पा रहे ।पुरानी भुलें बार-बार दोहराई जाए तो वह गलती नहीं अपराध की श्रेणी में आ जा जाती है ,नवजात छत्तीसगढ़ पर सत्तासीन होने का पहला मौका कांग्रेस को ही मिला था।


शासन ऐसा कि विपक्षियों में क्या अपनों में भी खौफ था  ,बहुमत के बाद भी विपक्षी दल तोड़ा गया, नेता प्रतिपक्ष को लाठियों से कुटा गया ,आकाश से मीडिया को अपना भोंपू और बाकियों  को नियंत्रित किया गया परिस्थितियां  ऐसी  बनी की पार्टी टूटी ऊंचे कद काठी के दिग्गज नेता  को कांग्रेस छोड़ एनसीपी का दामन थामना पड़ा ।  अंतोगत्वा छत्तीसगढ़ ने जग्गी हत्याकांड और सत्ता की मदान्धता  भी देखी, पार्टी में उपजा असंतोष धीरे-धीरे जनआक्रोश में परिवर्तित हुआ और कैसे पार्टी तीन लगातार विधानसभा चुनाव हार कर डेढ़ दशकों तक सत्ता से बाहर रही ।
फिर वही तीन  साल वाली परिस्थितियां क्यों  बनाई जा रही? प्रथम मुखिया के व्यक्तित्व और प्रतिभा पर हर छत्तीसगढ़िया को नाज होगा पर उनकी नकारात्मक राजनीतिक  छवि कैसे बन गई ?

सलाहकारों ने या  सत्ता के असीमित अधिकारों ने स्वेच्छाचारी शासन तंत्र की पुख्ता व्यवस्था छत्तीसगढ़ के लिए कर दी थी। दूसरों को छोटा करने की कोशिश ने  प्रतिभा और व्यक्तित्व का असामयिक अवसान करवा दिया । इस बार भी लंबे कद काठी के नेता निशाने पर है, तीर  आदिवासियों के नाम पर छोड़े जा रहे पर प्रत्यंचा और धनुष पर हाथ किसका है ? संवैधानिक पदों पर बैठे माननीय यदि अपने भावावेश पर काबू नहीं रख सकते, अपने ही मंत्री पर अनर्गल आरोप लगा सकते हैं तो वो सच्चे जनसेवक बन सकते हैं ? समदर्शिता और दूरदर्शिता के अभाव में आम मतदाताओं के साथ उनका व्यवहार कैसा होगा ?या फिर ये  नकारात्मक सोच से प्रसिद्धि पाने का सोचा समझा नवाचार है ? जिसे अब चाल उल्टी पड़ देख भावावेश का चोला पहनाया जा रहा है । प्रेस कॉन्फ्रेंस में इकट्ठा हुए  विधायकों और कारण बताओ नोटिस पर असंतोष की सुगबुगाहट दिखाने वाले 52 एकत्रित माननीयों की मंशा क्या थी ? यदि यह शक्ति प्रदर्शन था तो 70  साथ क्यों नहीं थे?  क्या ये खेमेबाजी की शुरुआत नहीं है ?अपराध दर्ज करवा कर खुलेआम आरोप लगाने के बाद सिर्फ खेद व्यक्त कर देने से मसले को पटाक्षेप हो गया ,कानून और सदन दोनों का समय जाया नहीं किया गया ।क्या भावावेश में इस बात की छूट मिल जाती है कि आप माननीय है इसलिए मन मर्जी कर ले मतदाता का मत क्यों और कैसे मिला ? आप कैसे सत्तासीन हुए ऐतिहासिक बहुमत जो आपने प्राप्त किया क्या आप उन सब का अपमान नहीं कर रहे ? क्या आप छत्तीसगढ़ियों  का अपमान नहीं कर रहे ?  

कॉमेडी शो का पूरे प्रदेश में विस्तारीकरण करने की उपलब्धि आपके साथ जुड़ गई रामानुजगंज की टिकट और सीट क्या अब आप बचा पाएंगे?


आदिवासी हितों की बात करने वाले राजनेताओं को ये  भी बताना होगा कि सत्ता के शिखर के लायक उन्हें उनकी पार्टी क्यों नहीं समझती है, क्यों वह विधायक दल के नेता नहीं चुने ,जा पाते ना तब एका है ना अब  एका  है छत्तीसगढ़ की हर राजनीतिक गतिविधियों में  बात आदिवासी और आदिवासी हितों की होती है पर हर बार नेतृत्व गैर आदिवासियों के हाथ चला जाता है  क्या ये  आत्म अवलोकन की बेला नहीं है ? दूध में खटाई आप  से ही क्यों डलवाई जाती है ,फटे दूध को मथ के माखन कैसे बना लेंगे आप?


जो घट गया घट गया पहली  नहीं रहीम की दूसरी पंक्ति अंगीकार कर लीजिए

रूठे सजन मनाइए, जो रूठे सौ बार.
रहिमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ता हार.

दबंगई और कुटिलता उतनी ही जितनी छत्तीसगढ़िया और छत्तीसगढ़ महतारी बर्दाश्त कर सके बाकी माननीय गुरुवों (बृहस्पति ) आपकी  मर्जी चुनाव गुरु ने लड़वाया,गुरु गुड़ ही रहा चेला चला बनने शक्कर (घनचक्कर)….