मुद्रा स्फीति तो हम झेल रहे ये राजनीतिक स्फीति नहीं झेलेंगे मुद्रास्फीति मजबूरी है राजनीतिक स्फीति नामंजूर

मुद्रा स्फीति तो हम झेल रहे ये राजनीतिक स्फीति नहीं झेलेंगे मुद्रास्फीति मजबूरी है राजनीतिक स्फीति नामंजूर

@रमेश साहू

लोकप्रिय लोकलुभावन राजनीति में राजनीतिक दल इतने मशगुल  हो चली है कि उन्हें अपनी सत्ता कायम रखने के लिए अपने कामों से ज्यादा मुफ्त की योजनाओं पर भरोसा है । बढ़ती महंगाई की दुहाई देने वाली सरकारों को जनहित की  कितनी चिंता है ये  उनके कार्यों और बयानों से मूल्यांकित किया जा सकता है । ढुलमुल रवैया राजनीति का ना तो जनहित को साध पा रहा न हीं अर्थव्यवस्था सध रही । देश प्रदेश में अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारें हैं, पर रवैया एक  जैसा ही है । मुफ्त में यदि पानी, बिजली, राशन से लेकर चुनावी सालों में मोबाइल, लैपटॉप, टीवी, पायल साइकिल बांटे जाएंगे तो इसका आर्थिक भार करों के रूप में देश की जनता को ही भरना होगा। राजनीतिक दल अपने तिजोरी से तो जनकल्याण के लिए फूटी कौड़ी निकालने से रहे करोड़ों अरबों का राजनीतिक चंदा हासिल करने वाले किसी भी राजनीतिक दल का कोई स्कूल, कॉलेज, अस्पताल देश के किसी कोने में नहीं चल रहा है, पर ये  सरकारी पैसों पर मुक्त की योजनाएं लेकर अर्थव्यवस्था पर वोट की खातिर चोट कर  रहे ।  पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ती कीमतों पर रार  करने वाली सरकारें इसका  उपभोग बराबरी से कर रही ।
राज्य और केंद्र दोनों का इन कीमतों में हिस्सा है और इससे होने वाली भारी कमाई की वजह से ही ये   जीएसटी से  राज्यों के विरोध की वजह से बाहर है । पेट्रोलियम और आबकारी दो ऐसे विभाग हैं जिनके बिना राज्य सरकारों का अस्तित्व ही संकट में आ जाएगा । सरकारें नए आय  के संसाधन नहीं बना पा रही है  रेट  {टैक्स} बढ़ा अपनी अकर्मण्यता छुपा रही है ।यदि ऐसा ही रहा तो घी  पीकर लेकर कर्ज पीने की सरकारी चाहत देश की अर्थव्यवस्था को कहां पहुंचा देगी । पेट्रोलियम पदार्थों का बड़ा उत्पादक और निर्यातक देश जहां आज भी   पेट्रोलियम की कीमतें ना के बराबर है वो वेनेजुएला भयंकर आर्थिक संकट और मुद्रास्फीति की मार झेल रहा है जहां एक बोतल पानी की कीमत हजारों में है वो पेट्रोलियम उत्पादित कर भी अपनी अर्थव्यवस्था को नहीं बचा पाए तो आप टैक्स लगाकर कब तक बचा लेंगे वहां भी यही मुफ्त की योजनाओ वाली सरकारी बीमारी थी जिसने देश को बीमार अर्थव्यवस्था और स्तरहीन जीवन दिया ।राज्य सरकारों की आय से यदि पेट्रोलियम और आबकारी को हटा दिया जाए तो इनके सुशासन  के सारे पोल   खुल जायेंगे   सरकार  की मुफ्त की योजनाएं देश को मुद्रास्फीति की ओर ढकेल रही है।
लोकतंत्र में संख्या बल सबसे महत्वपूर्ण हो गया है सत्ता की चाबी संख्याबल  {बहुमत} पर आधारित है तो अब जम के संख्या बल साधने की कोशिश हो रही है । छत्तीसगढ़ भी इस राजनीतिक स्फीति का शिकार हो रहा है केंद्रीय मंत्रिमंडल का विस्तार होने वाला है दशकों से प्रदेश में सांसदों का संख्या बल एक तरफा बीजेपी की तरफ झुका हुआ है, फिर भी दशक बीत गए छत्तीसगढ़ से किसी को केबिनेट मंत्री बने एनडीए और यूपीए दोनों सरकारों में  छत्तीसगढ़ को  ये अवसर नहीं मिला ।  प्रदेश के राजनेताओं को सोचना होगा कि उनकी चमक अब दिल्ली में क्यों फीकी पड़ रही है ग्यारह  सांसदों की संख्या वाली  छत्तीसगढ़ से एक भी नहीं केबिनेट मंत्री और जो है  उन्होंने छत्तीसगढ़ में अपनी कितनी पहचान बनाई है राजनीतिक नेतृत्व यदि इतना कमजोर होगा तो छत्तीसगढ़ का विकास कैसे होगा ?
छत्तीसगढ़ से  कम सांसद वाले राज्यों जैसे उत्तराखंड, हिमाचल ,झारखंड ,हरियाणा को भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सेदारी मिली हुई है, राजनीति की एकतरफा जीत में दोनों  दल  मसगूल  हो गए है और छत्तीसगढ़ीयों  का हित प्रभावित हो रहा है । दोनों को अपनी बहुमत और जीत का गुमान हो गया  एक छत्तीसगढ़ीयों को केंद्रीय मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व देने में कंजूसी कर रही है ,तो दूसरा आज तक निगम मंडलों में नियुक्तियां नहीं कर पा रहे  है। ऐसे  कैसे नेतृत्व पनपेगा ? कार्यकर्ता कैसे  उत्साहित होंगे  ? जीत क्या सिर्फ राजनीतिक दलों की  होती है ? जिसके आगे छत्तीसगढ़ का हित हार जाता है? क्यों दशकों  से छत्तीसगढ़ के साथ ये  राजनीतिक अन्याय हो रहा ?क्या ये छत्तीसगढ़ीयों  के दरियादिली का इनाम है? बिना राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिए आप कैसे छत्तीसगढ़ीयों का दिल जीत लेंगे ?मुद्रा स्फीति तो हम झेल रहे ये राजनीतिक स्फीति  नहीं झेलेंगे मुद्रास्फीति मजबूरी है राजनीतिक स्फीति नामंजूर….