जानिए क्यों है पीढ़ियों के लिए खतरनाक सिकल सेल ?

छत्तीसगढ़ में सिकल सेल को लेकर अलग यूनिट की स्थापना तो की गई है.लेकिन इसका असर ना के बराबर है. आज भी तीन समुदायों में इस बीमारी की अधिकता (Know why sickle cell is dangerous for generations) है.

जानिए  क्यों है पीढ़ियों के लिए खतरनाक सिकल सेल ?
KNOW WHY SICKLE CELL IS DANGEROUS FOR GENERATIONS

छत्तीसगढ़ में सिकल सेल के मरीज सबसे ज्यादा चिन्हित समुदाय के लोगों में ही पाया जाता है. छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा चिन्हित तीन समुदाय में सिकल सेल की बीमारी अत्यधिक पाई जाती है. इस बीमारी का इन समुदायों में पाए जाने का क्या कारण है और इस बीमारी के मरीजों की छत्तीसगढ़ में क्या स्थिति है. ये जानने की हमारी टीम ने कोशिश की है.

कहां हैं सिकल सेल के मरीज : मध्य भारत खासकर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और विदर्भ में रक्त की अनुवांशिक बीमारी सिकल अधिकतम पाई जाती है. सिकल सेल की बीमारी खासकर अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक और गरीब तबकों में होती (Sickle cell found in three communities in Chhattisgarh) है. सिकल के मरीज को हाथ पैर में दर्द, संक्रमण से लड़ने की क्षमता में कमी, खून की कमी के कारण धीरे-धीरे शरीर का हर अंग खराब हो जाता है. अधिक से अधिक 15 से 20 वर्ष की उम्र तक इनकी अकाल मृत्यु हो जाती है. अक्सर इस बीमारी की पहचान ही नहीं हो पाती . लोग अज्ञानता और साधनों की कमी से समुचित इलाज नहीं करा पाते.

किन समुदायों में है ज्यादा असर : सिकल सेल की बीमारी लाइलाज है . यह इंसान के मृत्यु तक उसके खून में पाई जाती है. इस बीमारी से शरीर में खून की कमी हो जाती है . मरीज को बार-बार खून की आवश्यकता पड़ती है. शहर के मशहूर डॉक्टर प्रदीप सहारे ने बताया कि '' मलेरिया के प्रकोप को खत्म करने के लिए प्रकृति ने खुद में बदलाव किया. प्रकृति के बदलाव के दौरान कुछ गड़बड़ी हो गई जिसकी वजह से मध्य भारत में रहने वाले यहां के मूल निवासी के जींस में कुछ परिवर्तन हुआ और यह परिवर्तन सिकल सेल के रूप में उभरा. छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा इन बीमारियों के लक्षण आदिवासी, गौड़ समाज, साहू समाज और कुर्मी समाज में पाया जाता है.

आनुवांशिक बीमारी है सिकल सेल : सिकल एक अनुवांशिक बीमारी है, जिसमें रोगी के लाल रक्त कण ऑक्सीजन की कमी से सिकल के आकार में बदल जाते हैं. सिकल का आकार हंसिए( बूम रैंक) के जैसा होता है. इसलिए इसे सिकलसेल या सिकलिन की बीमारी कहा जाता है. यदि माता और पिता के अंदर सिकल का एक-एक जीन है तो पैदा होने वाला बच्चा सिकल सेल से पीड़ित होगा. क्योंकि सिकल के 2 जिन मिलकर सिक्लिंग की बीमारी बनाते (Sickle cell is a genetic disease) हैं.

बच्चों में जाती है बीमारी : बच्चा पैदा होने से पहले माता-पिता को बच्चे के सिकल सेल की जांच करानी चाहिए. क्योंकि यदि बच्चा सिकलिन बीमारी लेकर पैदा होगा.तो माता पिता के लिए काफी तकलीफदेह बन जाता है. बच्चों में सिकल की बीमारी से बार-बार खून की कमी उत्पन्न होती है. उन्हें खून की जरूरत पड़ती है. इसलिए बच्चे के पैदा होने से पहले ही सिकल की जांच करानी चाहिए.

क्या होते हैं सिकल सेल बीमारी के लक्षण : सिकल सेल बीमारी अपने साथ कई लक्षण लेकर आती है.
• सिकल की बीमारी से पीड़ित बच्चों में बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता कम होती है. जिससे उन्हें बार-बार इन्फेक्शन होते हैं. बैक्टीरिया पूरे शरीर में फैलने का खतरा बना रहता है. जैसे बैक्टीरिमिया सेप्टीसीमिया, सेप्टीसीमिया और मेनिनजाइटिस आदि यह जानलेवा है. इंफेक्शन तीन चार महीने की उम्र के बाद कभी भी हो सकते हैं.


• सामान्यतः सिकल से लाल रक्त कण 20- 25 दिन चलते हैं, जबकि स्वास्थ्य व्यक्ति के लाल रक्त कण 120 दिन चलते हैं. जरा सा भी बुखार आने पर सिकलिंग बढ़ जाती है ज्यादा खून टूटने लगता है.खून की कमी को हो जाती है. जो जानलेवा भी हो सकती है. कभी-कभी बोनमैरो जो खून बनाती है वह भी फेल हो जाती है या प्लास्टिक कईसीस जिसमें एनीमिया, बिल्डिंग और इन्फेक्शन होते हैं.

• सिकल काइसिस वासो अक्लोहिव काईसिस बार बार होती है. जिसमें हाथ पैर में अत्यधिक दर्द और सूजन होती है. वासु अक्लोहिव का तुरंत और अच्छा इलाज ना मिलने पर या निमोनिया होने पर एक्यूट चेस्ट सिंड्रोम होने का खतरा रहता है.

• स्पिलिनीक सिकचिवस्ट्रेशनक्रिसिस में अचानक से बहुत सारा खून स्प्लीन या लिवर में जमा हो जाता है और मरीज शॉक में चला जाता है उपयुक्त व तुरंत इलाज ना मिलने पर जान जा सकती है. इनका इलाज सिकल के विशेषज्ञ और आईसीयू की सुविधा वाले हॉस्पिटल में ही कराना चाहिए.

सिकल जीन के लिए क्या है उपाय : जिन समाजों में सिकल पाया जाता है उनमें बच्चों के पैदा होते ही सिकल का टेस्ट करना चाहिए. 2 माह की उम्र के बाद पेनिसिलिन की दवा स्टार्ट करना चाहिए. सभी टीके लगवाएं. बुखार या अन्य बीमारियों का तुरंत इलाज कराना चाहिए. खून की कमी होने पर ब्लड चढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है. 9 महीने के बाद हाइड्रोक्सी यूरिया के कैप्सूल स्टार्ट करें, लगातार बिना गैप किए देते जाएं. दवा ठीक काम कर रही है या नहीं उससे कोई नुकसान हो तो इसके लिए डॉक्टर हर एक दो महीने में ब्लड टेस्ट करेंगे और दवा की मात्रा को एडजस्ट करेंगे. फॉलोअप बहुत जरूरी है. बच्चे की ग्रोथ मॉनिटरिंग करना चाहिए. क्रॉनिक ऑर्गन डैमेज तो नहीं हो रहा है इसके लिए वार्षिक चेकअप करना होता है. हर बार सिकल के बारे में अपडेट करना है. बहुत सारे मरीजों को सिकल की बीमारी का देर से पता लगता है तो उन्हें यह सभी इलाज स्टार्ट करना चाहिए और आगे स्वस्थ रहा जा सकता है.