अपनी शर्तों पर राजनीति करने वाले कल्याण सिंह के बारे में जानिए बड़ी बातें

एक टीवी इंटरव्यू के दौरान कल्याण सिंह ने कहा था कि लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट कूड़ेदान में फेंकने लायक है. ढांचा गिराना बिल्कुल भी साजिश नहीं थी. हमने सुरक्षा के सारे प्रबंध किए थे, बावजूद इसके ढांचा टूट गया.

अपनी शर्तों पर राजनीति करने वाले कल्याण सिंह के बारे में जानिए बड़ी बातें
कल्याण सिंह बीजेपी के दिग्गज और लोकप्रिय नेताओं में शुमार थे. (PS: Twitter)

भारतीय जनता पार्टी (BJP) आज सत्ता के शीर्ष पर है. लगातार दो लोकसभा चुनावों में पार्टी को देश की जनता ने पूर्ण बहुमत दिया है. देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भी बीजेपी का परचम लहरा रहा है. लेकिन यह इतनी आसानी से हासिल की गई सफलता नहीं है. इस सफर में जनसंघ से लेकर आज की बीजेपी के तमाम नेताओं का पसीना लगा है. उसी में एक नाम है कल्याण सिंह का.

राजनीतिक गलियारों में कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है. यानी देश की सत्ता पर काबिज होने के लिए उत्तर प्रदेश में जीत बहुत जरूरी है. जनसंघ के दौर से राजनीति में रहे कल्याण सिंह के नेतृत्व में बीजेपी ने पहली बार 1991 में उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई थी. कल्याण सिंह ने पार्टी को और खासकर कार्यकर्ताओं को आत्मविश्वास दिलाया था कि बीजेपी सिर्फ विपक्ष में बैठने वाला दल नहीं है.

बनियों की पार्टी में पिछड़ा वर्ग से आने वाले कल्याण सिंह का रुतबा काफी था

बनियों की पार्टी कही जानी वाली बीजेपी में पिछड़ा वर्ग से आने वाले कल्याण सिंह का काफी रुतबा था. वह अपनी शर्तों पर राजनीति करते थे. हालांकि जब पहली बार वो सत्ता में आए तो चुनौतियां कम नहीं थीं. राम मंदिर के लिए तब के बीजेपी अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने राष्ट्रव्यापी रथ यात्रा निकाली थी. राम मंदिर को लेकर मांग जोरों पर थी. अयोध्या में कारसेवकों का जमावड़ा लगने लगा था.

अभी कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बने एक साल से कुछ ज्यादा वक्त नहीं हुआ था. तभी 6 दिसंबर, 1992 की वह तारीख आ गई, जिसे उनके विरोधी ‘शर्म की घटना’ कहते हैं तो वह उसे राष्ट्रीय गर्व की बात. अपनी शर्तों पर राजनीति करने वाले कल्याण सिंह पर आरोप लगते रहे कि वे उस दिन चाहते तो घटना रुक सकती थी, लेकिन उन्होंने लापरवाही की. लिब्राहन आयोग ने तो कल्याण सिंह को बाबरी विध्वंस का अहम गुनाहगार तक बताया था. हालांकि कल्याण सिंह हमेशा अपनी भूमिका से इनकार रहे.

मस्जिद की आखिरी ईंट गिरते ही अपने हाथों से लिखा था त्याग पत्र

इन आरोपों पर एक टीवी इंटरव्यू के दौरान कल्याण सिंह ने कहा था कि लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट कूड़ेदान में फेंकने लायक है. ढांचा गिराना बिल्कुल भी साजिश नहीं थी. हमने सुरक्षा के सारे प्रबंध किए थे बावजूद इसके ढांचा टूट गया. अपनी बातों के पक्ष में कल्याण सिंह ने उस इंटरव्यू में कहा था कि जिस तरह अमेरिका के राष्ट्रति केनेडी और इंदिरा गांधी की सुरक्षा के पक्के इंतजाम होने के बाद भी घटना घटित हुई. ऐसा ही 6 दिसंबर 1992 को हुआ.

बाबरी विध्वंस की घटना के बाद कल्याण सिंह ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जब बाबरी मस्जिद को कारसेवकों ने अपने कब्जे में ले लिया था तब कल्याण सिंह अपने आवास पर अधिकारियों के साथ थे. जैसे ही मस्जिद की आखिरी ईंट गिरने की खबर मिली, कल्याण सिंह ने अपना राइटिंग पैड मंगवाया और अपने हाथों से अपना त्याग पत्र लिखा और उसे खुद लेकर राज्यपाल के यहां पहुंच गए.

वाजपेयी से अदावत के बाद कम होता चल गया राजनीतिक वजूद

कल्याण सिंह को लाल कृष्ण आडवाणी के खेमे का नेता माना जाता था. एक वक्त ऐसा आया कि कल्याण सिंह ने अपने पार्टी के सबसे बड़े नेता और देश के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से अदावत कर ली. एक बार उन्होंने यहां तक कह दिया था कि मैं भी चाहता हूं कि वो प्रधानमंत्री बनें, लेकिन उसके लिए पहले सांसद बनाना जरूरी है. उनके इस बयान के कारण उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया और वाजपेयी न सिर्फ लखनऊ से एमपी बने बल्कि देश के प्रधानमंत्री भी बने.

वाजपेयी से अदावत के बाद उनका राजनीतिक वजूद कम होता चला गया. उन्होंने बाद में अपनी पार्टी भी बनाई लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. स्थिति यहां तक आ पड़ी कि उन्हें मुलायम सिंह यादव से राजनीतिक मदद लेनी पड़ी. गौर करने वाली बात है कि मुलायम सिंह यादव का विरोध कर ही वह यूपी सीएम की कुर्सी तक पहुंचे थे.

अतरौली से 9 बार विधायक रहे कल्याण सिंह

कल्याण सिंह का जन्म 5 जनवरी 1932 को अलीगढ़ जिले के अतरौली में हुआ था. आगे चलकर कल्याण सिंह ने अतरौली विधानसभा सीट से 2002 तक कुल 9 बार विधायक बने. 1967 में पहली बार जीत मिलने और 2002 तक यहां कल्याण सिंह सिर्फ एक बार 1980 में हारे. फिलहाल उनके परिवार के ही संदीप सिंह यहां से विधायक हैं.

इस बीच, बीजेपी पर हमेशा ये आरोप लगता रहा कि कल्याण सिंह के साथ पार्टी ने उचित व्यवहार नहीं किया, लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी में जब सत्ता में आई तो कल्याण सिंह को राजस्थान का राज्यपाल बनाया गया.