इतिहास की सीख बंटवारे और आजादी के बीच

इतिहास की सीख बंटवारे और आजादी के बीच

@रमेश साहू
 
भूखे को रोटी और गुलाम को सत्ता दिखा आप कुछ भी बांट सकते हैं देश भी। इतिहास झकझोरता है उन्हें जिन्हें अपनी गलती का एहसास हो, गलती पर गलती वही करता है जिसमें विवेक शून्यता हो ,जो देश अपने आप को विश्वगुरु ,आदि मानव सभ्यता का जनक सोने की चिड़िया जैसे सत्यता और उपमाओं से अलंकृत होता आया हो जिसे अपनी गंगा जमुनी तहजीब पर नाज हो अपने समावेशी होने की बात कहता हो उसका विभाजन धर्म के आधार पर हो गया ।


गुलामी सैकड़ों वर्षो की हमने देखी विदेशी आक्रांता आते रहे देश लूटता रहा और हम अपनी आत्ममुग्धता में ही जीते रहे। सत्य से परे आचरण हो तो टुटन आर्थिक ,सामाजिक , मानसिक और भौगोलिक होता है। जजिया कर ,बलात धर्मांतरण के बाद भी देश एक था पहले स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में सबने साथ मिलकर लड़ी फिर ऐसा क्या हुआ कि स्वतंत्रता हमें बंटवारे के रूप में मिली। गुलाम देश के नागरिकों में क्या राजनीतिक महत्वकांक्षी एक ही दिन में पनप गई द्विराष्ट्र का सिद्धांत किसने क्यों और कैसे लाया ।


यह विदित तो है पर इसे छुपाया इसलिए जाता है कि भारतीय राजनेताओं को लोकतंत्र के रूप में राजतंत्र स्थापित करना था। राजतंत्र की जो खामियां गिनाई जाती है ,क्या भारत के लोकतंत्र ने उन खामियों को चक्रवृद्धि ब्याज के साथ क्या अंगीकार नहीं कर लिया है ?सारे जहां से अच्छा हिंदुस्ता लिखने वाले की भावनाएं पाकिस्तान के लिए यूं ही नहीं जागी होगीं ।कांग्रेस के रहते मुस्लिम लीग यूं ही नहीं बना होगा, सत्य तो यह भी है कि देश में चुनाव 47 के पहले भी हुए हैं। सारे चुनावों की मीमांसा होती है पर 46 के चुनाव का कोई जिक्र नहीं करना चाहता क्योंकि ये चुनाव बताते है धार्मिक ध्रुवीकरण इस कदर हावी था कि मुस्लिम प्रतिनिधित्व वाली सीटें मुस्लिम लीग ने 90% से अधिक जीती थी।


बंगाल ,बिहार, राजस्थान से लेकर हर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों मुस्लिम लीग ने जीत का परचम लहराया था ।मुस्लिम लीग द्विराष्ट्र के सिद्धांत पर चलकर सीटें जीत रहा था और कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता की चश्मे की वजह से यथार्थ नहीं देख पा रही थी ।स्वतंत्रता के लिए संग्राम तो 1857 में भी हुआ असफल हुआ पर देश बटा नहीं स्वतंत्रता के लिए आंदोलन उसके बाद भी हुआ पर देश बट गया ।विलायत से पढ़ कर आए कुलीन बुद्धिजीवियों के मन में शिक्षा में इतना स्वार्थ मिला दिया कि उन्हें सिर्फ अधिकार रूपी अपना हिस्सा सत्ता का दिखने लगा ।


कर्तव्य देश सेवा का गौण हो गया जो देश कभी गुलाम नहीं था वो हमसे 1 दिन पहले आजाद हो गया ये बताता है कि हमें आजादी नहीं बंटवारा मिला था ।देश ने गुलामी के दर्द से बंटवारे का दर्द छोटा समझा, बंटवारे को ही आजादी मानकर अंगीकार कर लिया ।पर क्या इतिहास बदला जा सकता है? यदि अपनी उपलब्धियों पर आपको गर्व है आप भारत रत्न भी है तो अपनी कमियों की जवाबदारी भी लेनी होगी ।क्या देश को बटवारा अहिंसा से मिला क्या हम ऐसा कहकर उन शुरवीर क्रांतिकारियों का अपमान नहीं करते जो कच्ची उम्र में फांसी के फंदे में झूले जिन्होंने भरी जवानी में गोलिया खाई ,क्यों इस देश के इतिहास में ये जिक्र नहीं है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की सरकार को कई देशों ने मान्यता दी थी ।


हम क्यों नहीं कहते कि अंग्रेजों से लड़कर नेता जी ने पहले स्वतंत्र सरकार बनाई? मान जाएंगे तो नेताजी का कद बढ़ा हो जाएगा जो आज के नेताओं को रास नहीं आएगा। खून से सनी लथपथ आजादी लाशों से भरी ट्रेनों में विस्थापन की मजबूरी ।अपनों के हाथों अपनों के गाजर मूली की तरह काटे जाने का शोर कभी ना कभी तो सुनाई देना ही था,वक्त का पहिया है उसे कब रुकना था वक्त है देश के और अपने राजनीतिक इतिहास को खंगालने का उससे सीख लेने का ।


आप बारंबार आजादी और आजादी में अपने योगदानों का महिमामंडन कर सकें वो समय नहीं रहा  समरथ को नहिं दोष गुसाईं’ ।जब तक सामर्थवान थे प्याज प्याज ही था अब छिलके उतर रहे तो आंखों में आंसुओं का उतरना तय है। सच पर पर्दा कब तक तकनीकी इतनी प्रभावी है कि अब झूठ घंटे भर नहीं टिक पाता आप सदियों के झूठ को आज भी वैसे ही दोहराना चाह रहे। समय बदल रहा, राजनीति भी बदल रही उपलब्धियों से इतना प्यार है तो अपनी गलतियों ,कमियों को स्वीकारना सीखिए ।बंटवारे को आजादी दूसरे की तरफ उंगली उठाने की योजना ने आपको ही सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया ।14 अगस्त अब पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस के अलावा दूसरे रूप में भी दर्ज होगा। विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’  आजादी का जश्न होना ही चाहिए पर क्या बंटवारे से कोई सीख नहीं लेनी चाहिए।


यदि 15 अगस्त का जिक्र होगा तो 14 अगस्त भी याद आएगा ही ।उपलब्धियों से नाता है तो कमियां भी आपके ही दामन में लगे हुए हैं ।आजादी की सबको बधाई पर इस बधाई की बेला में अखंड भारत का संकल्प । क्यों बिछड़ों का एका नहीं देखें तो आज भी गंगा जमुनी तहजीब कारगर है वैसे हमें समझना होगा  इतिहास की सीख बंटवारे और आजादी के बीच।