तो क्या अब तालिबान की वजह से आप नहीं खरीद पाएंगे अपना फेवरेट मोबाइल फोन

अफगानिस्‍तान में लिथियम का सबसे बड़ा भंडार है. ये लिथियम आज इलेक्‍ट्रॉनिक व्‍हीकल्‍स की बैटरी के अलावा मोबाइल फोन की बैटरी के लिए भी बहुत जरूरी है. साल 2010 में अमेरिकी रक्षा विभाग के एक मेमो में अफगानिस्‍तान के खनिज संसाधन को कम से कम 1 ट्रिलियन डॉलर की कीमत वाला बताया गया था.

तो क्या अब तालिबान की वजह से आप नहीं खरीद पाएंगे अपना फेवरेट मोबाइल फोन
प्रतीकात्मक तस्वीर। (फाइल फोटो)

मोबाइल फोन आज सबसे बड़ी जरूरत बन गया है. इस फोन की बैटरी से लेकर आप इसके लिए जो पावर बैंक यूज करते हैं, उसमें लिथियम बैटरी का प्रयोग होता है. मोबाइल फोन और पावर बैंक के अलावा इलेक्‍ट्रॉनिक कार में भी यही लिथियम यूज होता है. मगर तालिबान के अफगानिस्‍तान में लौटने के साथ ही आपके फेवरिट फोन और ई-कार पर खतरा मंडराने लगा है. 15 अगस्‍त को काबुल के साथ ही पूरे अफगानिस्‍तान पर कब्‍जा करने वाला तालिबान आपके मोबाइल फोन और फेवरिट टेस्‍ला कार के लिए सबसे बड़ा खतरा बनने वाला है.

लिथियम का सबसे बड़ा भंडार

तालिबान ने अब अफगानिस्‍तान में मौजूद करोड़ों टन मिनरल्‍स पर भी कब्‍जा कर लिया है. ये मिनरल्‍स या खनिज, क्‍लीन एनर्जी इकोनॉमी के लिए बहुत ही संवेदनशील हैं. अफगानिस्‍तान में मौजूद खनिज भंडार की आधिकारिक पुष्टि खुद अमेरिका ने कई बार की है. अब सबकी नजरें इस तरफ हैं कि आखिर तालिबान इनका क्‍या करेगा. अफगानिस्‍तान में लिथियम का सबसे बड़ा भंडार है.

साल 2010 में अमेरिकी रक्षा विभाग के एक मेमो में अफगानिस्‍तान के खनिज संसाधन को कम से कम 1 ट्रिलियन डॉलर की कीमत वाला बताया गया था. इस मेमो को ‘सऊदी अरब ऑफ लिथियम’ नाम दिया गया था. अमेरिकी जियोलॉजिस्‍ट को यहां पर भारी मात्रा में खनिज मिले थे और इसके बाद ही यह मेमो आया था. चांदी जैसा दिखने वाला लिथियम रिन्‍यूबल एनर्जी बैटरीज के लिए भी बहुत जरूरी है.

क्‍या होती है लिथियम बैटरी

लीथियम बैटरी को मॉर्डन बैटरी भी कहा जाता है. लिथियम बैटरी का पहला जिक्र साल 1970 में मिलता है. उस समय एमएस विटिंघम ने बिजली उत्पादन के लिए टाइटेनियम सल्‍फाइड और लिथियम मैटल का उपयोग किया था. यह पहला सफल प्रयोग कहा जा सकता है. 1980 में ऑक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी के जॉन गुडेनफ और कोईची मिजुशीमा ने रिचार्जेबल ​लीथियम बैटरी को तैयार किया था. जॉन गुडेनफ को लीथियम बैटरी का फादर भी कहा जाता है. इस प्रयोग के बाद काफी प्रगति देखने को मिली. बिजली प्रोडक्‍शन से लेकर लिथियम का प्रयोग कई और जगहों पर किया जाता है. साल 1991 में सोनी और असाही कासई द्वारा पहली लिथियम बैटरी को पेश किया गया.

खनिज भंडार पर बैठा है तालिबान

रिपोर्ट आने के 10 साल बाद भी अफगानिस्‍तान में जारी युद्ध, भ्रष्‍टाचार और दूसरी वजहों से यहां मौजूद खनिज को छुआ नहीं जा सका है. अमेरिका जिसकी क्‍लीन एनर्जी सप्‍लाई चेंस चीन में हैं, अब परेशान है. तालिबान के कंट्रोल में यहां के खनिज भंडार का आना अमेरिकी आर्थिक हितों के लिए बड़ा खतरा है. चीन फिलहाल लिथियम निर्यात में नंबर वन है. वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक काउंसिल ऑन स्‍ट्रैटेजिक रिस्‍क्‍स में इकोलॉजिकल सिक्‍योरिटी प्रोग्राम के मुखिया रॉड स्‍कूनोवर कहते हैं कि अब तालिबान दुनिया में सबसे रणनीतिक खनिज भंडार पर बैठा है. ये देखना होगा कि वो इसका कैसे प्रयोग करेंगे.अफगानिस्‍तान पर कब्‍जा करने के साथ ही  तालिबान क्‍लीन एनर्जी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

लिथियम की मांग में होगा 40 गुना इजाफा

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की मानें तो साल 2040 तक दुनिया में लिथियम की मांग 40 गुना तक बढ़ जाएगी. उसके अलावा कॉपर कोबाल्‍ट और दूसरे खनिजों की मांग में भी तेजी आएगी. अफगानिस्‍तान इस मामले में दुनिया का सबसे अमीर देश है. क्‍लीन एनर्जी प्रोजेक्‍ट अफगानिस्‍तान को अमीर बनाने की ताकत रखता है. अफगानिस्‍तान के राष्‍ट्रपति अशरफ गनी ने किसी समय में देया में मौजूद खनिज भंडार को एक श्राप तक करार दे डाला था.

रूस और चीन का होगा कब्‍जा

तालिबान गैर-कानूनी तरीके से देश के खनिज भंडार का प्रयोग करता आया है. उसे इसके प्रयोग से 300 मिलियन डॉलर का सालाना रेवेन्‍यू तक हासिल हुआ है. स्‍कूनोवर की मानें तो तालिबान ग्‍लोबल लिथियम ट्रेड में उतरेगा, इस बात के बारे में सोचना ही मूर्खता है. साल 2007 में चीन ने अफगानिस्‍तान में 3 बिलियन डॉलर की रकम वाला एक कॉपर माइनिंग प्रोजेक्‍ट शुरू किया था. मगर बाद में इसे बंद कर दिया गया था. स्‍कूनोवर कहते हैं कि चीन और रूस के पहले ही तालिबान के साथ अच्‍छे संबंध हैं. ऐसे में दोनों देश यहां पर नया बिजनेस शुरू करेंगे, इस बात में कोई शक नहीं है.