पूज्यपाद अनन्त श्रीविभूषित उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं पश्चिमाम्नाय द्वारका शारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के प्राकट्य दिवस गुरुकृपा सप्ताह पर नरसिंहपुर जिले के पत्रकार समीर खान की विशेष प्रस्तुति

पूज्यपाद अनन्त श्रीविभूषित उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं पश्चिमाम्नाय द्वारका शारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के प्राकट्य दिवस गुरुकृपा सप्ताह पर नरसिंहपुर जिले के पत्रकार समीर खान की विशेष प्रस्तुति

पूज्यपाद अनन्त श्रीविभूषित उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं पश्चिमाम्नाय द्वारका शारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के प्राकट्य दिवस गुरुकृपा सप्ताह पर नरसिंहपुर जिले के पत्रकार समीर खान की विशेष प्रस्तुति

*????अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।*
*तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।????*
✍समीर खान, नरसिंहपुर.
????फिरंगी भारत में व्यापार के बहाने आये और फिर धीरे-धीरे हिंदुस्तान के मुख्तलिफ हिस्सों पर कब्जा करने लगे, उनके जुल्मों सितम के आगे हल और बखर हांकने वाले नागरिकों का हाल बुरा हो गया। अमन चैन और भाईचारे के साथ रहने वाले नागरिकों, विभिन्न समुदायों, मजहबों को निशाना बनाया जाने लगा, धर्म को मिटाने की पुरजोर कोशिशें जारी रहीं। फिरंगी हिंदुस्तान की कौमी एकता को नेश्तनाबूद करने पर उतारू हो चले, कारतूसों में चर्बी का इस्तेमाल करने लगे जिससे धर्मों को नुकसान पहुंचे। यहां अंग्रेज धर्म को समूल नष्ट करने, ग़ुलाम भारत को लूटने बर्बाद करने में लगे थे और वहां घने जंगलों वनों में बैठे एक मनोहारी बालक, राम की पोथी का स्मरण करने में लीन थे, उन बालक के मन में पराधीन भारत को आजाद कराने के साथ धर्म को बचाये रखने का ज्वार उछाल मार रहा था। स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ने वाले सेनानियों का स्वप्न था स्वराज... लेकिन बालक के ह्रदय में देश के साथ धर्म को बचाने की पीड़ा भी स्पष्ट नजर आ रही थी। बालक जब माँ भगवती का स्मरण करते तो भारतमाता उनके चित्त में समा जाती, चिन्तन इतना कि कई रोज भूखे रहते यहां तक कि जल भी ग्रहण न करते। धर्म और राष्ट्र के चिंतन ने बालक के मन में क्रांति का संचार भर दिया। यह बालक कोई सामान्य बालकों की तरह नहीं थे, जिस उम्र में बच्चे खिलौने के लिए मचलते हैं उस उम्र में यह बालक धर्म और देश को बचाने की जिद ठानकर निकल पड़े। उस समय बालक की उम्र कोई 8-9 वर्ष की रही होगी। वह मन में विचारों का वेग समाहित कर, भारत और धर्म को बचाने वैराग्य की ओर चल पड़े। वह बालक जब चलते तो लगता जैसे भूत, भविष्य, वर्तमान उसके इर्द-गिर्द घूम रहे हों। बालक की आँखे ऐसी कि देखने वाला सम्मोहित हो जाये, ललाट, केश, तन-मन-वचन कर्म ऐसे कि साक्षात महादेव का बाल अवतार हों। यह बालक आज ही की तिथि में 98 वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश के सिवनी जिले के ग्राम दिघौरी में उपाध्याय परिवार के यहां हाथ में सुंदर सुजान कृपा निधान के नाम की पोथी और धर्म की पताका लेकर ब्राह्मण कुल में प्रकट हुए। पोथी लेकर प्रकट हुए बालक को नाम मिला पोथीराम, यही बालक जब समय काल के हिसाब से शास्त्र, वेद, ऋचाओं, धर्म का परचम चारों दिशाओं में फैला चुके तो सम्पूर्ण भारत को कहना पड़ा जगद्गुरु... जी हाँ यह वही शंकराचार्य जी हैं जिनके बालरूप का जिक्र इस लेख में ऊपर किया गया है। जब बालक पोथीराम जी धर्म व राष्ट्र के मर्म को समझते हुए वैराग्य पथ पर निकले तो स्वामी मुक्तानन्द जी ने मार्ग प्रशस्त किया फिर वेदों, शास्त्रों को जानने समझने के लिए पोथीराम जी महाराज ने वाराणसी की ओर अपने कदम बढ़ाए। यही नहीं क्रांतिकारी विचारधारा से ओत प्रोत भारतमाता को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाने महज 19 वर्ष की आयु में पोथीराम जी स्वतंत्रता आंदोलन के मैदान में डटकर खड़े हो गए, रेल की पटरियां उखाड़ी, फिरंगियों के भवनों को आग के हवाले किया इसके परिणाम स्वरूप काशी में 9 माह का कारावास बिताया। देश आजाद हो चुका था और हर तरफ हिंदुस्तान-जिंदाबाद, भारतमाता की जय, वंदेमातरम के नारे गूंज रहे थे, हमें स्वराज मिल चुका चुका था। अब पोथीराम जी ने अपने मनोयोग से संपूर्ण चिंतन मनन मानव जाति के लिए करते हुए ज्योतिर्मठ के तत्कालीन शंकराचार्य श्री ब्रम्हानन्द जी से सन्यास दीक्षा ली। ज्ञान का यह सिलसिला स्वामी अखण्डानन्द जी, उड़िया बाबा, महेशानन्द जी से चलकर स्वामी करपात्री जी की सोहबत तक आ पहुंचा यहां तक आते आते पोथीराम जी की नाम उपाधि स्वरूपानंद जी हो चुकी थी। ख्याति और मूरत ऐसी कि हर कोई दर्शन को आतुर हो जाता, पग कमल थामने शिष्य व्याकुल हो जाते और आशीर्वचन पाने अधीर हो जाते। स्वरूपानंद जी ने स्वामी करपात्री जी महाराज से भगवती राज राजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी की दीक्षा प्राप्त की और हमारा सौभाग्य है कि तप-जप के लिए नरसिंह धरा पर अपने चरण धरे, उनका प्रताप यह रहा कि गोटेगांव के छोटे से स्थान को ज्योतेश्वर परमहंसी धाम बना दिया, यह वही स्थान है जहां जगत की पालनहारी माँ राज राजेश्वरी विराजमान हैं। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज होकर भी मर्यादा पुरुषोत्तम का स्मरण अपने प्राकट्य से आत्मा में भगवान राम की साँसों की माला को फेरते हुए राम जन्मभूमि के लिए रामजन्म भूमि पुनुउद्धार समिति बनाई और भारत वर्ष के साधु, संत, महात्माओं को संग लेकर न्यायिक जंग लड़ी और फतह पाई। महाराज जी ने राम जन्मभूमि उद्धार हेतु चुनार जेल यात्रा को सहन किया। आपको याद दिला दिलाता चलूँ कि जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की मुहब्बत और इनायत से यह क्षेत्र फलीभूत है उनकी दुआओं से ही परमहंसी धाम से लगे क्षेत्रों में सभी मजहब के लोग बड़े ही खुलूस और अकीदत के साथ रहते चले आ रहे हैं। आज महाराज जी की यौमे विलादत है तो आपके लिए यह जानना जरूरी है कि-
नारायण समारम्भाम शंकराचार्य मध्यमाम अस्मादचार्यपर्यान्ताम वन्दे गुरूपरम्पराम
भगवान आद्य शंकराचार्य जो आज से पच्चीस सौ वर्ष पूर्व इस भारत भूमि पर अवतरित हुए जो अद्वैत परंपरा के महान प्रवर्तक हुए जिससे ये भारत जगद्गुरु कहा जाने लगा। आज से 98 वर्ष पूर्व परम पूज्य प्रातःस्मरणीय जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज का अवीर्भाव हुआ। पूज्य महाराज श्री का जन्म मध्यप्रदेश के सिवनी जिला के अंतर्गत बेन गंगा के सुरम्य तट पर स्थित ग्राम दिघोरी में पंडित धनपति उपाध्याय जी एवं गिरिजा देवी जी के घर में भाद्रशुक्ल तृतीया मंगलवार सम्वत 1982 वर्ष 2 सितंबर 1924 रात्रि के समय हुआ। आपको ग्राम की पाठशाला में अध्ययन हेतु भेजा गया, आपने अल्पायु में ही रामायण गीता एवं पुराण का ज्ञान अर्जित कर लिया था, आप संत महात्माओं के प्रति आस्था भक्ति एवं शास्त्र अभ्यास करने लगे। नर्मदा तटों वनों का उद्धार करते हुए आप 1940 में काशी पहुंचे, काशी में संस्कृत का अध्ययन किया। अगस्त 1942 में स्वामी जी ने देश की रक्षार्थ योजना बनाकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सत्याग्रही छात्रों के साथ तार काटने के अभियोग में बनारस के जेल में 9 माह की सज़ा भोगी। उस समय के शासन के दृष्टि में आप स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे अधिक खतरनाक आंदोलनकारी माने गये, स्वतंत्रता संग्राम के लड़ाई में पुनः राजनैतिक बंदी के रूप में दो माह तक नरसिंहपुर जेल में रहे और भारत की आज़ादी के बाद स्वत्रंतता संग्राम सेनानी बने।
ज्योतिर्मठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी ब्रम्हानंद सरस्वतीजी से कलकत्ता में पौष सुदी एकादशी 1950 में दंड सन्यास ग्रहणकर दंडी सन्यासी स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के नाम से विख्यात हुए। महाराज श्री ने अपनी तपस्या स्थली परमहंसी गंगा में भगवती राज राजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी का विशाल मंदिर बनवाया जिसकी प्रतिष्ठा 26 दिसम्बर 1982 को   श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी श्री अभिनव विद्या तीर्थ जी महाराज के करकमलों के द्वारा सम्पन हुई जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ लगभग दस लाख श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
7 दिसम्बर 1973 को ज्योतिर्मठ के  शंकराचार्य के रूप में आपका पट्ट अभिषेक दिल्ली में समारोह पूर्वक संपन्न हुआ, स्वामी करपात्री जी महाराज एवं गोवर्धन मठ पुरी के शंकराचार्य स्वामी श्री निरंजन देव तीर्थ द्वारका पीठ के शंकराचार्य श्री अभिनव सच्चिदानंद तीर्थ जी महाराज ने स्वयं उपस्थित होकर अभिषेक संपन्न किया। 27 मई 1982 को  गुजरात के द्वारकाधीश मंदिर प्रांगण में ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी अविनव सच्चिदानंद तीर्थ महाराज जी की इच्छा पत्र के अनुसार स्वामी अभिनव विद्या तीर्थ जी महाराज के द्वारा पश्चिममाम्नाय द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य के पद पर आपका अभिषेक किया गया, तबसे अब तक आप दो पीठों के शंकराचार्य के पद को सुशोभित कर रहे हैं। महाराज जी ने धर्म के साथ ही मानव सेवा कर्म को भी प्राथमिकता दी। गुजरात के शिवलिंगाकार मंदिर कलकत्ता में राजराजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी का मंदिर तथा विश्व कल्याण आश्रम में आदिवासियों के उपचार हेतु एक अस्पताल बनवाया।
भारत के विभिन्न शहरों में आपने कई गौशालाएं, चिकित्सालय एवं आश्रम बनवाएं। आपने अपनी माता की जन्म स्थली कातल बोड़ी (मात्र धाम) में राजराजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी का विशाल मंदिर बनवाया। इसी तरह अपनी जन्म स्थली दिघोरी (गुरुधाम) में स्फटिक का विशाल शिवलिंग की स्थापना की, उत्तर एवं दक्षिण शैली के इस विशाल शिव मंदिर में प्रतिष्ठा के समय चारों पीठों के शंकराचार्य ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। महाराज श्री द्वारा अपने अमृत वचनों में हमेशा मानव कल्याणकार की बात करते हुए युवाओं को उन्होंने पौराणिक परंपराओं और संस्कारों को जीवंत करने का आह्वान किया है। ज्योतिष और द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की हैसियत सनातन (हिंदू) धर्म में धर्म सम्राट की है। देश के अलावा दुनिया में भी उनके शिष्यों की संख्या लाखों में है, उनका द्वार हमेशा गरीबों, बेबसों के लिए खुला रहता है। मुझे याद है बीते साल राम मंदिर निर्माण को लेकर ज्योतेश्वर धाम में हुई धर्म सभा के दौरान जहां मंच से एक तरफ श्लोक, चौपाई और राम के नाम की अलख जग रही थी तो वहीं उसी मंच से मुस्लिम बंधु महाराज जी के प्रति अपनी मुहब्बत का पैगाम दुनिया को दे रहे थे। आज महाराज जी 98 वर्ष पूर्णकर अपने 99 वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, गुरुधाम जगमग है, आओ हम सब मिलकर ऐसे कृपालु, दीन हीन को सबल बनाने वाले, कोमल हृदय के स्वामी, जगद्गुरु, शिव स्वरूप, दया बरसाने वाले जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज जी को वंदन और नमन करें।
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*भये प्रकट कृपाला धनपति के लाला*
*गिरिजा देवी हितकारी*
*मष्तक तेज कल्याण काज*
*अद्भुत छवि मनोहारी*
*सनातन ध्वजा कर थामे*
*जिव्हा वेद-शास्त्र बखानी*
*भूत-भविष्य-वर्तमान को साधे*
*शंकर छवि तुम्हारी*
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नोट- समय समय पर महाराज जी पर लिखे गए विभिन्न पत्र पत्रिकाओं, लेखों और जानकारी पर आधारित यह लेख लिखा गया है, अगर भूलवश कोई त्रुटि हुई हो तो माफी का तलबगार हूँ।
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पूज्यपाद प्रात: स्मरणीय, सत्य सनातन धर्म ध्वजा रक्षक, धर्म सम्राट अनन्त श्री विभूषित ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवम् द्वारकाशारदा पीठाधीश्वर जगतगुरू शङ्कराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज श्री के प्राकट्य दिवस पर शत शत वंदन।
Date- 09 सितंबर 2021