सर्वशक्तिमान से दूर हुए लोगों की छटपटाहट और उनकी आकुलता उनमें ही भगदड़ मचा रही है भाजपा जवान हो रही और कांग्रेस (विपक्ष) बूढ़ी….

सर्वशक्तिमान से दूर हुए लोगों की छटपटाहट और उनकी आकुलता उनमें ही भगदड़ मचा रही है भाजपा जवान हो रही और कांग्रेस (विपक्ष) बूढ़ी….

@रमेश साहू
 
सत्ता सर्वशक्तिमान है, और उस सर्वशक्तिमान पर स्थापित होने के उद्देश्य से राजनीतिक संगठन {दल}बनाए जाते,और उन दलों के सक्रिय सदस्य जिनको राजनीतिज्ञ कहते हैं उस सत्ता की कुर्सी पर काबिज होने परिक्रमा करते हैं, जिस दिन से सत्ता की कुर्सी पर परिश्रम की जगह परिक्रमा की महत्ता स्थापित हुई राजनीतिज्ञों ने भी परिक्रमा वादी होना श्रेयस्कर समझ लिया । आज देश की राजनीति फिर परिक्रमा और परिश्रम के परिणामों का अंतर देख रही है । सर्वशक्तिमान से दूर हुए लोगों की छटपटाहट और उनकी आकुलता उनमें ही भगदड़ मचा रही है अब भगदड़ में कोई कैसे सत्ता शिखर तक पहुंचे अपने ही गिरा दे रहे भीड़ यदि विवेक छोड़ दे उन्मादी बन जाती है। एकता की चाहत में विवेक होता है और विवेकहिन एकता उन्मादी भीड़ पैदा करती है ।


आजादी के बाद दशकों तक एक ही राजनीतिक दल था जिसका राष्ट्रीय प्रभाव था और ये दशकों कायम भी रहा, प्रभुता गवाने कि सुदूर दक्षिण से शुरू हुई जो धीरे-धीरे अखिल भारतीय राजनीतिक प्रभाव को क्षीण करती गई । ये राजनीतिक हास् किसी दूसरे राष्ट्रीय दल की वजह से नहीं बल्कि क्षेत्रीय छत्रपो के उभरने से हुई, अलग-अलग कारणों से कांग्रेस के नेता पार्टी से अलग होते गए । दूसरे क्षेत्रीय छत्रपो की राजनैतिक हैसियत ने उन्हें प्रेरित किया, राजनीतिक पार्टी से परिवारिक प्राइवेट लिमिटेड पार्टी बनने के लिए । क्योंकि कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों केंद्रीय नेताओं को लगने लग गया कि उनसे ज्यादा अच्छी राजनैतिक हैसियत और भविष्य इन छोटे दलों के नेताओं का है । प्रतिभा परिश्रम की जगह परिक्रमा ने असंतुलन और असंतोष दोनों पैदा किया इस कालखंड में समय की दूसरी छोर को पकडे दूसरी विचारधारा ने अपनी राजनैतिक ताकत शनैः शनैः बढ़ाया ।


दशकों की राजसत्ता ने भ्रम में जनतंत्र की जगह राजतंत्र के बीच रोपित कर दिए थे सो कामों पर कम कानों पर ज्यादा विश्वास ने भी राजनीतिक हीनता दी । रही सही कसर 77 की गलती के बाद सत्ता में रहते विपक्षियों में हुए बिखराव ने पूरी कर दी की गलती कितनी भी बड़ी हो विपक्ष का सत्ता तक पहुंचना असंभव है वो अपने अंतर्विरोधो से अवसान के ही लायक है, सत्ता हमारी ही बपौती है इस जनता शासन के अवसान ने भारतीय राजनीति को नई दिशा दी थी फिर जो सत्ता में आये उनको सत्ता का गुमान इतना था की ये सोच ही नहीं पाए की उनको उसी बिखरे कुनबे के किसी घड़े से राजनीतिक चुनौती मिलेगी, सत्ता गंवानी पड़ेगी । सिकुड़ते जनाधार ढहते राज्यों के किलो की निरंतरता भी उनमें राजनीतिक बोध नहीं जगा पाई । जिन क्षेत्रीय दलों के कंधों पर अपना बोझ रख राष्ट्रीय पहचान बचाए जाने की कोशिश की गई वो भी लोगों को छद्म गठजोड़ लगा जनमत ने नकार दिया । कश्मीर से कन्याकुमारी तक परिवारवाद की राजनीति परवान चढ़ती रही और राष्ट्रीय राजनीति में भी परिवारवाद ही मुख्य भूमिका में थी ।


परिवारों का राजनीतिक विरोध आम मतदाता और कार्यकर्ता को इसलिए भाने लगा कि उसे दूसरी अपनी राजनैतिक और सामाजिक संभावनाएं दिखने लगी विकास को परिवार के बाहर निकल सामाजिक और राष्ट्रीय होते देखा । बाप की बेटे वाली पार्टी और पुरानी पार्टियों ने में अब उम्र का भी दबाव है बुढ़ी होती विपक्षी राजनीति जिसने दूसरी पंक्ति का कोई नेता परिवार के बाहर का न स्वीकारा ना बनने दिया अब उस जवान सत्तारूढ़ दल से कैसे राजनीतिक चुनौतियां स्वीकार कर पाएगा । सरकार तीसरी बारी की जीत की तैयारी में हैं और विपक्षी दल के नेता अपनी अपनी सीट बचाने की राजनीतिक अदूरदर्शिता ने वो परिस्थिति पैदा कर दी । केंद्रीय मंत्रिमंडल के नए युवा चेहरों की सहभागिता बता रही है कि सत्तारूढ़ दल उनके कंधों को मजबूत करना चाह रही है कि वो भविष्य में सत्ता संपादन प्रभावी रूप से कर सकें । एक तरफ सत्ता संचालन की प्रभावी कोशिश तो दूसरी तरफ सत्ता प्राप्ति की निष्प्रभावी कोशिशें निष्प्रभावी, स्वहिती ,स्वसुखदाई ,आत्ममुग्धता
कहां ये समझा पाएगी कि:- भाजपा जवान हो रही और कांग्रेस (विपक्ष) बूढ़ी….