ढाई साल ने ढाई अक्षर प्रेम को ऐसे तिरोहित किया शीर्षस्थ के हितों पर टकराव होने लगा खुजली कर घाव बनाबो गढ़बो नवा छत्तीसगढ़…..

ढाई साल ने ढाई अक्षर प्रेम को ऐसे तिरोहित किया शीर्षस्थ के हितों पर टकराव होने लगा खुजली कर घाव बनाबो गढ़बो नवा छत्तीसगढ़…..

रमेश साहू


 नजर ना लगे उसके लिए काजल लगाने की पुरानी परंपरा है  । छत्तीसगढ़ में इसे काजर आंजना कहते हैं और छत्तीसगढ़ की छत्तीसगढ़ी मुहावरा है आंजत आंजत कानी कर डारेस लगता है छत्तीसगढ़ की स्वघोषित छत्तीसगढ़िया सरकार इस मुहावरे पर शब्द सह  आचरण करने की मंशा बना चुकी है ।  ऐतिहासिक बहुमत की सरकार अपने अदूरदर्शी राजनीतिक फैसलों की वजह से न सिर्फ घिर रही है बल्कि अपनों का शिकार कर मृत प्राय विपक्ष को संजीवनी प्रदान कर रही हैं ।


विपक्ष में बैठी भाजपा 15 साल को सत्ता सुख की वजह से इतना सुविधाभोगी हो चुकी है कि उसे रोड में उतरना गवारा नहीं है 15 साल के विपक्ष  भूमिका निभा सत्ताशील हुई कांग्रेस अब अपनों से संघर्ष और अपनों में ही विपक्षी ढूंढ रही है ,एक विधायक जिसने पूर्व मंत्री और तत्कालीन जिला अध्यक्ष पर ऐसे ही आरोप पूर्व में लगाए थे उनकी बातों की महत्ता ऐसी  बढ़ी की प्रेस वार्ता में 18 विधायक उनके पीछे लामबद हो गए। कानो कान किसी को खबर नहीं हुई और उन्होंने तीर साध दिया  ।राजा साहब एक बाबा थे रामलीला मैदान छोड़कर गए तो, कांग्रेस की  केंद्रीय सत्ता हाथ से निकल गई छत्तीसगढ़ के बाबा आज भावुक होकर अपने व्यक्तित्व पर उठते सवालों पर शालीन जवाब सहित सदन छोड़ गए ।इस घोषणा के साथ कि इस पवित्र सदन में तब तक नहीं आएंगे जब तक सरकार इस मसले पर उनकी भूमिका स्पष्ट नहीं करेगी, सवाल ये है सरकार स्पष्ट क्या करेगी घटना घटित हुई विधायक सही बोल रहे तो मंत्री लपर सवाल यदि घटना घटित नहीं हुई तो विधायक पर सवाल सरकार का यह धर्म संकट गृह मंत्री के वक्तव्य में भी झलका  ।


जिस मसले का पटाक्षेप होना प्रभारी महासचिव कल घोषित कर चुके थे यही मसला अब अघोषित रूप से रण घोष कर रहा है,या तो महासचिव ने मसले को समझा नहीं या फिर जो पहलावान जीते वह मेरा की तर्ज पर फर्ज निभा कर चले गए। विधानसभा सत्र में संबंधित मंत्री के विभागों के प्रश्नों का उत्तर कौन देगा ?क्या उनकी उपस्थिति यक्ष प्रश्न बनकर सरकार और सदन दोनों के लिए परेशानी का सबब नहीं बनेगी?  हमला नितांत व्यक्तिगत है ,पारिवारिक पृष्ठभूमि से लेकर राजा शब्द, सामंतवाद का पर्याय बता उत्पीड़न का इतिहास गिनाया  जा रहा  है यदि राजा शब्द सामंती है, तो दाऊ कौन से लोकतंत्र की उपज है ,राजा, जमीदार ,मालगुजार कांग्रेस के लिए तब भी माननीय थे आज भी माननीय है। फिर दो सामंती शब्दों के अलग-अलग पर्याय कैसे ?
पानी में कंकड़ मारने चले थे भूल गए बरसात है, बरस गए बाबा सदन छोड़कर मजबूर कर दिया जवाब  ढूंढने के लिए सरकार को अराजकता वर्तमान राजनीति का अभिन्न अंग बन गई है ।और अपनी ही बहुमत की सरकार के लिए अराजकता पैदा कर देना किन सलाहकारों की सलाह है, इस घटना की जांच हो ना हो समझौते से मसला आप दबा  भी ले  फिर भी ये इतिहास में दर्ज हो गया कि खेमेबाजी है । ढाई साल ने ढाई अक्षर प्रेम को ऐसे तिरोहित किया शीर्षस्थ के  हितों पर टकराव होने लगा ।
कायल तो उस हिम्मत का होना चाहिए जिसने प्यादे ने राजा को शह मात  का निर्णय अपने हाथ में ले लिया ।संयोजन की क्षमता प्रायोजित भी हो तो भी वो  इस आदिवासी बहुल प्रदेश के सबसे बड़े आदिवासी नेता हैं, जिनके साथ 18 विधायक हैं सरगुजा के हैं इसलिए अब वही वहां के सबसे बड़े नेता हैं ।बड़े को छोटा कर छोटे को बड़ा बनाने की ये नई नीति है जिसका परिणाम अपनी ही भद्द पिटवाना  बयान राजनीतिज्ञों के आ रहे सदन पर वक्तव्य पर विधायक के पी .एस .ओ . एफ आई आर लिखने वाली पुलिस बिल्कुल खामोश है ,किसी को इस षड्यंत्र में तिवारी की भूमिका दिख रही है पर बियारी  के बाद अपनों की चुगली से प्रभावित होने की बात समझ नहीं आ रही। शायद छत्तीसगढ़ की राजनीति में खुजली कर घाव बनाने की कोशिश हो रही


मतलब खुजली कर घाव बनाबो  गढ़बो नवा छत्तीसगढ़…..